गलतियों से जुदा तु भी नहीं, मैं भी नहीं, दोनों इंसान हैं, ख़ुदा तु भी नहीं, मैं भी नहीं, गलतफहमियों ने कर दी दोनों में पैदा दूरियां, वरना फितरत का बुरा तु भी नहीं था, मैं भी नहीं।
उस अजनबी से मुझे इतना प्यार क्यों है, इंकार करने पर भी चाहत का इकरार क्यों है, उसे पाना नहीं मेरी तकदीर में शायद, फिर हर मोड़ पे उसी का इंतज़ार क्यों है।
भले ही राह चलते तू औरों का दामन थाम ले, मगर मेरे प्यार को भी तू थोड़ा पहचान ले, कितना इंतज़ार किया है तेरे इश्क़ में मैंने, ज़रा इस दिल की बेताबी को भी तू जान ले।
बिन आपके कुछ भी अच्छा नहीं लगता, अब मेरा वजूद भी सच्चा नहीं लगता, सिर्फ आपके इंतज़ार में कट रही है ये ज़िंदगी, वरना अब तक तो मौत के आगोश में सो जाती ये ज़िंदगी।