एक मुक़्क़मल शायरी है तू कुदरत की

तेरी सादगी को निहारने का दिल करता है,
तमाम उम्र तेरे नाम करने को दिल करता है,
एक मुक़्क़मल शायरी है तू कुदरत की,
तुझे ग़ज़ल बना कर जुबां पर लाने को दिल करता है।

हम भटकते रहे थे अनजान राहों में

हम भटकते रहे थे अनजान राहों में,
रात दिन काट रहे थे यूँ ही बस आहों में,
अब तम्मना हुई है फिर से जीने की हमें,
कुछ तो बात है सनम तेरी इस निगाहों में।

मेरे महबूब को तुम ने भी अगर देखा है

आज इस एक नज़र पर मुझे मर जाने दो,
उस ने लोगों बड़ी मुश्किल से इधर देखा है,
क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना,
मेरे महबूब को तुम ने भी अगर देखा है।

तेरे नैनों ने काली घटा का काजल लगाया

फ़िज़ाओं का मौसम जाने पर, बहारों का मौसम आया,
गुलाब से गुलाब का रंग तेरे गालों पे आया,
तेरे नैनों ने काली घटा का काजल लगाया,
जवानी जो तुम पर चढ़ी तो नशा मेरी आँखों में आया।

शराब सा नशा है तेरी निगाहों में

ना जाने कौन सा जादू है तेरी बाहों में,
शराब सा नशा है तेरी निगाहों में,
तेरी तलाश में तेरे मिलने की आस लिए,
दुआऐं मॉगता फिरता हूँ मैं दरगाहों में।

सुना है वो आँखों से अपना बना लेते हैं

नशीली आँखों से वो जब हमें देखते हैं,
हम घबरा कर आँखें झुका लेते हैं,
कौन मिलाये उन आँखों से आँखें,
सुना है वो आँखों से अपना बना लेते हैं।

क्यों मिलायें उन आँखों से आँखें

सुर्ख आँखों से जब वो देखते हैं,
हम घबराकर आँखें झुका लेते हैं,
क्यों मिलायें उन आँखों से आँखें,
सुना है वो आँखों से ही अपना बना लेते हैं।